Description
बुद्ध या कार्ल मार्क्स’, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर की यह महत्त्वपूर्ण कृति गौतम बुद्ध और कार्ल मार्क्स के बिचारों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पाठ सबसे पहले 1987 में डॉ. बाबासाहब आबेडकर ‘राइटिंग्स अँड स्पीचेस’, खंड 3 के अंतर्गत प्रकाशित हुआ और बाद में 2014 में डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन द्वारा पुनः प्रकाशित किया गया।
निबंध के कुछ प्रमुख बिंदु :
डॉ. आंबेडकर भारतीय समाज की खामियों, विशेषकर जाति प्रथा और भेदभाव की पड़ताल बुद्ध और मार्क्स की शिक्षाओं की तुलना करके करते हैं।
वे बताते हैं कि बुद्ध की शिक्षाएँ निजी संपत्ति के उन्मूलन और व्यक्तिगत आत्मज्ञान पर आधारित हैं, जो आधुनिक साम्यबाद जैसी समानतामूलक समाज व्यवस्था की ओर ले जा सकती हैं।
वे इसकी तुलना मार्क्स के ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ से करते हैं, जो हिंसक साधनों जैसे कि सर्वहारा की तानाशाही पर आधारित है।
निबंध में दोनों व्यक्तियों द्वारा सुझाए गए साधनों का तुलनात्मक विबेचन है जहाँ बुद्ध व्यक्तिगत आचार और नैतिक आचरण पर बल देते हैं, वहीं मार्क्स क्रांतिकारी हिंसा और तानाशाही की वकालत करते हैं।
अंतत डॉ. आंबेडकर का तर्क है कि भारत जैसे समाज के लिए बुद्ध की शिक्षाएँ जातिबिहीन समाज और आत्मज्ञान पर आधारित दृष्टि मार्क्स के विचारों की तुलना में अधिक प्रासंगिक और उपयुक्त हैं।
हालांकि इस पाठ में डॉ. आंबेडकर की राय बौद्ध शिक्षाओं के पक्ष में अधिक झुकाब लिए हुए प्रतीत होती है, फिर भी यह निबंध बुद्ध और मार्क्स की विचारधाराओं के बीच दिलचस्प तुलना प्रस्तुत करता है। यह पाठको को समानता और सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में मार्क्सबादी विमर्श और बौद्ध दर्शन दोनों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है।






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